जब से तुझको देखा जब से तुझको जाना मैंने जिंदगी को जाना इसको पहचाना तुझ पे ही तो चलती तुझपे ही ढलती ये जो जिंदगी मेरी आ चले संग थोड़ी दूर मुलाजिम बन गई तेरी मोड़ जिस ता साथ जाना बस तक बस तेरा ही हो जाना
उमर मेरी पचपन याद आ रहा बचपन गुड्डे गुडियों की शादी करना डॉक्टर डॉक्टर खेल का समा बंधना कागज के समान तैयार करना नाव कागज की पानी मै तैराना दिन भर उधम मचाना भरी धूप में पतंग उड़ाना खेलते खेलते थक कर रुकना थक कर मां के आंचल में छुपना जब भी जाते इधर उधर फैला लगते हम बिल्कुल छैला कुछ ऐसा था बचपन याद आ रहा जब उमर पचपन।।
सरहद पर हरदम डटा रहा घर के भेडियो से मैं लड़ता रहा मओवादियों से हरदम लड़ता उग्रवादियों से मैं नहीं डरता तेरी गोद की मैं संतान भारत भूमि का मैं इंसान फसलों को मैं उगाता रहा खेती कर घर चलाता रहा स्वदेशी चीजों की अलख जलाता सब भाइयों को खाना देता तेरी गोद की मैं संतान भारत भूमि का मैं इंसान अंतरिक्ष की खाक छानता पूरा विश्व मुझे मानता शून्य के बिना जैसे गणित ना पूरा मेरे बिना जैसे विश्व अधूरा ज्योतिष,भौतिक या विज्ञान खगोल,गणित या अनुसंधान तेरी गोद की मैं संतान, भारत भूमि का मैं इंसान
सूरज की तरह खिल रहा मेरा चमन , अब हो रहा हमेरा पतन, यू ही चलते फिरते गिर पड़ा मैं,I फिर से उठने काओश कर रहा हूं जतन , नहीं मेरा कोई वतन है नहीं मेरा कोई गगन, पर फिर भी कोहीशि कर रहा हूं, यूं ही भर जाए बिन आंसू मेरे नयन।।।